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वन्दे मातरम् - मूल पाठ, सरल अर्थ और इस्लामी दृष्टि से विवेचन


 यह लेख किसी भावना को ठेस पहुँचाने या विवाद के लिए नहीं, बल्कि इस्लामी दृष्टिकोण को शांति, सम्मान और तर्क के साथ स्पष्ट करने के उद्देश्य से लिखा गया है।
*भूमिका*  
मुसलमान अपने धर्म में तीन बातों का विशेष ध्यान रखते हैं: 
*1. आस्था (विश्वास)*
*2. बोली (भाषा)*
*3. कर्म (व्यवहार)* 
इन तीनों में वे पूरी कोशिश करते हैं कि कहीं भी अल्लाह के साथ किसी को साझी न ठहराया जाए।
*आस्था (विश्वास)*
मुसलमान उसी पर विश्वास रखते हैं जो क़ुरआन और सही हदीस से सिद्ध हो, और जो इसके विरुद्ध हो उसे स्वीकार नहीं करते।
किसी विद्वान या व्यक्ति की बात तब तक नहीं मानते, जब तक वह इन शिक्षाओं के अनुरूप न हो।
*बोली (भाषा)*
वे अपनी भाषा में ऐसे शब्द नहीं बोलते जिनसे पूजा, बंदगी या ईश्वर जैसी भावना अल्लाह के अलावा किसी और के लिए प्रकट हो।
*कर्म (व्यवहार)* 
वे अपने व्यवहार में भी सावधानी रखते हैं कि कोई कार्य अल्लाह के अलावा किसी और की पूजा जैसा न बन जाए।
*तोहिद और शिर्क का अर्थ*
*तोहिद*
तोहिद का अर्थ है:
केवल एक ईश्वर की पूजा करना
उसी को सृष्टि का रचयिता मानना
पूजा उसी तरीके से करना जैसा बताया गया है!
इस्लाम में कोई भी उपासना तभी स्वीकार होती है, जब उसमें दो ज़रूरी शर्तें हों:
*पहली शर्त:*
उपासना केवल ईश्वर के लिए की जाए।
इसका मतलब यह है कि हृदय में कोई दिखावा, नाम या लाभ की भावना न हो,
बल्कि केवल ईश्वर को प्रसन्न करना ही उद्देश्य हो।
*दूसरी शर्त:*
उपासना उसी तरीके से की जाए, जैसा हज़रत मुहम्मद ﷺ ने बताया है।
उन्होंने सही परंपराओं में नमाज़, रोज़ा और दूसरी उपासनाओं का तरीका सिखाया है।
मुसलमान अपनी ओर से कोई नया तरीका या नई उपासना नहीं बना सकते।
अगर इन दोनों में से एक भी शर्त पूरी न हो,
तो वह उपासना अल्लाह के यहाँ स्वीकार नहीं होती और अस्वीकार कर दी जाती है।
 इस्लाम धर्म की सबसे बड़ी अच्छाई तोहिद मानी जाती है।
*शिर्क*
शिर्क का अर्थ है:
ईश्वर के साथ किसी और को जोड़ना
किसी व्यक्ति, वस्तु या प्रतीक को ईश्वर जैसा मानना
किसी और से अलौकिक सहायता मांगना
शिर्क इस्लाम में सबसे बड़ा पाप माना जाता है।
इसी कारण मुसलमान तोहिद और शिर्क के विषय में बहुत संवेदनशील होते हैं।
*अध्ययन की भूमिका*
इन बातों को ध्यान में रखते हुए अब हम वन्दे मातरम् के पदों का अध्ययन करेंगे और देखेंगे कि क्या इनमें ऐसी बातें हैं जो इस्लामी विश्वास के विरुद्ध हैं।
प्रत्येक पंक्ति को क्रम संख्या के साथ प्रस्तुत किया गया है और फिर उसका सरल अर्थ और विवेचन दिया गया है।
*1. वन्दे मातरम् — मूल पाठ*
1. वन्दे मातरम्
2. सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
3. शस्यशामलां मातरम्
4. शुभ्रज्योत्स्ना पुलकित यामिनीम्
5. फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्
6. सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम्
7. सुखदां वरदां मातरम्
8. वन्दे मातरम्
9. सप्तकोटिकण्ठकलकलनिनादकराले
10. द्विसप्तकोटिभुजैर्धृतखरकरवाले
11. अबलाकेणमां धृतबलकेणमां
12. नमामि तारिणीं रिपुदलवारिणीं मातरम्
13. वन्दे मातरम्
14. त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
15. कमला कमलदलविहारिणी
16. वाणी विद्यादायिनी नमामि त्वाम्
17. नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
18. सुजलां सुफलां मातरम्
19. वन्दे मातरम्
*2. वन्दे मातरम् — हिंदी अर्थ*
1. मैं माँ को नमन करता हूँ |
2. जो जल और फलों से भरपूर है।
3. जो हराभरी है।
4. जो चाँदनी रात जैसी सुंदर है।
5. जो फूलों और पत्तों से सजी है।
6. जो मधुर बोलती है और मुस्कराती है।
7. जो सुख और वरदान देती है।
8. मैं माँ को नमन करता हूँ।
9. जिसकी आवाज़ करोड़ों लोगों जैसी है।
10. जिसकी शक्ति करोड़ों भुजाओं जैसी है।
11. जो निर्बलों को बल देती है।
12. मैं उस रक्षक माँ को नमन करता हूँ जो शत्रुओं को हराती है।
13. मैं माँ को नमन करता हूँ।
14. तुम दुर्गा जैसी हो।
15. तुम कमला जैसी हो।
16. तुम वाणी जैसी हो, मैं तुम्हें नमन करता हूँ।
17. मैं तुम्हें पवित्र और महान मानकर नमन करता हूँ।
18. जो जल और फलों से भरी है।
19. मैं माँ को नमन करता हूँ।
*3. आपत्तियाँ और उनका विवेचन*
आपत्ति 1 — पंक्ति 1, 8, 13, 19
*पंक्ति: वन्दे मातरम्*
*अर्थ:* मैं माँ को नमन करता हूँ।
*विवेचन:*
यह गीत बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था।
इसमें देश की धरती को माँ और देवी के रूप में दिखाया गया है, और उसकी वंदना की भावना पाई जाती है।
हिंदू परंपरा में धरती को “माता” और “देवी” मानकर पूजना आम बात है।
इसी कारण कवि देश को भगवान जैसा मानकर उसकी वंदना करता है।
“वंदे” शब्द कभी केवल सम्मान के लिए होता है,
लेकिन कभी पूजा के अर्थ में भी लिया जाता है।
यदि इसे पूजा के रूप में लिया जाए, तो यह इस्लामी विश्वास के विरुद्ध हो जाता है।
कुछ लोग कहते हैं कि इसे सिर्फ़ देश-प्रेम के रूप में समझा जाए, पूजा के रूप में नहीं।
लेकिन गीत के बाद के पदों से पता चलता है कि यह बात सही नहीं लगती,
क्योंकि आगे धरती को देवी और शक्ति के रूप में बताया गया है।
इससे साफ़ समझ में आता है कि यहाँ धरती को केवल देश नहीं,
बल्कि एक पूज्य और माबूद के रूप में ही माना गया है।
तभी आख़िरी पंक्तियों का मतलब पूरा बनता है।
लेकिन इस्लाम में:
पूजा और सजदा सिर्फ़ अल्लाह के लिए होता है।
किसी इंसान, जगह या चीज़ को भगवान जैसा मानना या उसकी पूजा करना जायज़ नहीं है।
इसलिए अगर “धरती माँ” को ईश्वर या माबूद समझकर नमन किया जाए,
तो यह इस्लाम के अनुसार सही नहीं है।
*आपत्ति 2 — पंक्ति 7*
*पंक्ति*: सुखदां वरदां मातरम्
*अर्थ:* जो सुख और वरदान देती है।
*विवेचन:*
सुख और वरदान देना केवल अल्लाह का अधिकार माना जाता है।
किसी और को यह शक्ति देना अनुचित समझा जाता है।
*आपत्ति 3 — पंक्ति 12*
*पंक्ति*: नमामि तारिणीं रिपुदलवारिणीं मातरम्
*अर्थ:* जो बचाने वाली और शत्रुओं को हराने वाली है।
*विवेचन:*
बचाने और संकट से निकालने वाला केवल अल्लाह होता है।
इस शक्ति को किसी और से जोड़ना सही नहीं माना जाता।
*①* जो मदद इंसान की ताक़त के अंदर हो
यानी वह मदद जो आदमी अपने ज़ोर, समझ और साधनों से कर सकता है,
जैसे:
डॉक्टर का इलाज करना
किसी को डूबने से बचाना
भूखे को खाना देना
मुश्किल में किसी की मदद करना
ऐसी मदद के बारे में कहना ठीक है कि “फलाने ने मेरी मदद की”,
क्योंकि यह इंसान की ताक़त में होता है और वह अल्लाह का ज़रिया बनता है।
*②* जो मदद इंसान की ताक़त से बाहर हो
यानी वह मदद जो किसी इंसान के बस में नहीं होती,
जैसे:
तूफ़ान को रोक देना
भूकंप या बाढ़ को टाल देना
अचानक मौत से बच जाना
नामुमकिन हालात से निकल आना
ऐसी मदद सिर्फ़ अल्लाह ही कर सकता है।
इस तरह की मदद अल्लाह के अलावा किसी और से माँगना सही नहीं है।
*आपत्ति 4 — पंक्ति 14 से 17*
*पंक्तियाँ:* दुर्गा, कमला, वाणी से संबंधित पंक्तियाँ
*अर्थ:* देश को देवी के रूप में प्रस्तुत करना। 
*विवेचन:* 
दुर्गा, कमला और वाणी देवी मानी जाती हैं।
इस्लाम में किसी को देवी जैसा दर्जा देना शिर्क माना जाता है।
क़ुरआन में अल्लाह तआला शिर्क के बारे में कहता है:
وَمَن يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَقَدْ حَرَّمَ اللَّهُ عَلَيْهِ الْجَنَّةَ وَمَأْوَاهُ النَّارُ ۖ وَمَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ أَنصَارٍ
अनुवाद:
“और जो कोई अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराए,
तो अल्लाह ने उस पर जन्नत हराम कर दी है,
और उसका ठिकाना जहन्नम है।
और ज़ालिमों का कोई मददगार नहीं होगा।”
क़ुरआन (सूरह अल-माइदा: 72)
अल्लाह के साथ किसी को देवी, देवता या बराबर मानना बहुत बड़ा गुनाह है،और इससे मृत्यु के बाद का जीवन बर्बाद हो जाता है।
यह बात भी समझना ज़रूरी है कि इसका मतलब यह नहीं है कि मुसलमान दूसरों के देवी-देवताओं को बुरा कहते हैं।
बल्कि क़ुरआन में साफ़ तौर पर मना किया गया है कि अल्लाह के अलावा जिनकी पूजा की जाती है, उन्हें गाली या अपमानजनक शब्द न कहे जाएँ। अल्लाह तआला कहता है!
وَلَا تَسُبُّوا الَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ فَيَسُبُّوا اللَّهَ عَدْوًا بِغَيْرِ عِلْمٍ ۗ كَذَٰلِكَ زَيَّنَّا لِكُلِّ أُمَّةٍ عَمَلَهُمْ ۖ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّهِم مَّرْجِعُهُمْ فَيُنَبِّئُهُم بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
(सूरह अल-अनआम: 108) 
अनुवाद: 
“और तुम उन लोगों को बुरा न कहो जिन्हें वे अल्लाह के अलावा पुकारते हैं,
क्योंकि वे नासमझी में अल्लाह को बुरा कहने लगेंगे।
इस तरह हर समुदाय को उनके काम अच्छे लगते हैं।
फिर सबको अपने ईश्वर की ओर लौटना है,
और वह उन्हें उनके कर्मों का पूरा हिसाब बताएगा।”
इस्लाम सिखाता है कि अपने धर्म पर कायम रहते हुए भी दूसरों के विश्वास का अपमान न किया जाए،
बल्कि सम्मान और समझदारी के साथ बात की जाए۔
*आपत्ति 5 — पंक्ति 9 और 10*
*पंक्तियाँ:* करोड़ों आवाज़ और करोड़ों भुजाओं वाली पंक्तियाँ
*विवेचन:*
इनमें अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा की गई है।
यदि इसे अलौकिक शक्ति समझा जाए तो यह गलत माना जाता है।
*4. समग्र निष्कर्ष*
1. वन्दे मातरम् की कुछ पंक्तियों में पूजा और देवी-भाव दिखाई देता है।
2. इस्लाम में पूजा केवल अल्लाह के लिए होती है।
3. किसी और को अल्लाह जैसी शक्ति देना स्वीकार नहीं किया जाता है।
4. इसी कारण बहुत से मुसलमान इसे धार्मिक रूप से स्वीकार नहीं कर पाते।
5. यह विरोध देश से नफरत के कारण नहीं, बल्कि धार्मिक विश्वास की रक्षा के लिए होता है।
अगर कोई कहे कि “भारत में रहना है तो मुसलमानों को यह कहना ही पड़ेगा”,
तो यह बात सही नहीं है।
भारत के संविधान (Constitution of India) का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपने धर्म पर चलने की पूरी आज़ादी देता है।
यह एक मौलिक अधिकार है और देश के बुनियादी क़ानूनों में शामिल है। 
*अनुच्छेद 25*
25. अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता
*(1)* सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन,
सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान अधिकार है।
*(2)* इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को इस बात से नहीं रोकेगी कि वह—
*(क)* किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधि को नियंत्रित या सीमित करे, जो धार्मिक आचरण से जुड़ी हो;
*(ख)* सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए कानून बनाए या हिंदुओं के सभी वर्गों और उपवर्गों के लिए सार्वजनिक धार्मिक संस्थानों को खोले!
इसका मतलब यह है कि:
हर नागरिक को अपने धर्म पर चलने की पूरी आज़ादी है۔
किसी को उसके धार्मिक विश्वास के ख़िलाफ़ मजबूर नहीं किया जा सकता۔
यह एक मौलिक अधिकार है، और इससे टकराने वाला कोई भी क़ानून टिक नहीं सकता۔
इसलिए मुसलमान भारत से प्यार करते हैं और देश के वफ़ादार नागरिक हैं،
लेकिन वे अपने धर्म के ख़िलाफ़ कोई बात कहने या करने के लिए मजबूर नहीं हो सकते।
देश से प्रेम और धर्म पर चलना — दोनों एक साथ संभव हैं۔
इसलिए यह कहना गलत है कि भारत में रहने के लिए धर्म छोड़ना पड़ेगा۔
*लेखक: एक सेवक*
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